• Facebook
  • YouTube
  • Instagram
  • हक्कासाठी आंदोलन

"मजूर वास्तव"

"मजूर वास्तव"

- संतोष खिल्लारे


शहरो में घर बनवाये वहा रहनेको न दिया।

जंहा रोड बनवाये उसपर चलने न दिया ।

कभी डंडे तो कभी भूक की मार।

झूठे सपने दिखाकर वोट हमसे जो लिया।

जब चाहिए तब इस्तेमाल किया।

जब तुम्हारी बारी आई तो मुकर लिया ।

कहते थे हवाई चपल से नहीं हवाई जहाज से सफर करवायेंगे ।

हवाई सफर तो नहीं करवाया कमसे कम ट्रैन से ही छोड़ देते।

हम तो नहीं चाहते थे तुमहारा बस और तुमाहरी ट्रैन ।

हम तो चले थे पैदल मगर तुमने तो ट्रैन के निचे ही कुचल दिया।

किसी की माँ किसी का बेटा रस्ते पे नज़र गड़े है।

कब आयेंगा मेरा बेटा ! कब आएगा मेरा पिता !

क्या जवाब देंगे ? कोण जवाब देगा उनको?

तुम्ही ने तो कहा था विकास आएगा।

कहा है ओ। रेल्वे की पटरी पर सो रहा है।

या तप्ति रास्तो पर से चलके आरहा है ।

*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*